कृष्ण प्रेम

कृष्ण के प्रेम का असर ये हुआ, 
मैं हर पल उन्हे ही सिमरता रहा, 
वो यमुना के तट रास रचते रहे, 
मैं गोपी बन साथ उनके नचता रहा, 
होंठों पर कन्हैया के राधे नाम था, 
सब गोपियों के दिल मे सिर्फ श्याम था, 
बंशी की धुन पर सब यु खो गए, 
श्याम रटते-रटते सुध-बुध खो गए, 
परम ये सौभाग्य था मुझको मिला, 
बंशी बन श्याम से मैं बजता रहा, 
हर जन्म मुझको उनकी ही भक्ति मिले, 
मैं रात से सुबह तक यही रटता रहा, 
उनकी लीलाएं मुझ को लुभाने लगी, 
अपनी रचनाओ में मैं उनको भजने लगा, 
मेरे चारों तरफ कृष्ण ही कृष्ण हैं, 
मैं भक्ति में उनकी हूँ खोने लगा। 

हरे कृष्णा। 

लेखक- रितेश गोयल 'बेसुध'

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