एक ख्याल

आखिर तक खड़ा रहा मैं इंतजार में,
वो थामेंगी बाहें मेरी आकर बीच बाजार में,
खामोशियों से बातें करता रहा इसी खुमार में,
कभी तो गूँजेगी हंसी उसकी मेरे गुलबहार में,
वो आई नहीं,जिंदगी की सुबह से रात हो गई,
मेरा जनाजा उठा,और उसकी बारात हो गई।
लेखक-रितेश गोयल 'बेसुध'

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