डूबते को तिनके का सहारा

एक रात हमने अपने बीवी के खाने में नुस्ख निकाला, उसने पूरी रात सुना-सुना कर मेरे दिमाग का दही कर डाला,
मैंने उसकी तारीफ में कसीदें पढ़ कर बड़ी मुश्किल से अपनी जिंदगी को उभारा,
इसे कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा,
एक दिन मेरे दिमाग में मेरा विश्वास तोड़ा,
मेरे शरीर से अपना अधिकार छोड़ा,
एक 4xl हसीना को देखकर आंख ने खुद को झपकाया,
उस हसीना ने भी अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया,
वो तो शादी को तैयार थी,
पर आंँख में कुछ जाने का बहाना करके बड़ी मुश्किल से मैंने परिस्थिति को संभाला,
इसे कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा,
वैसे तो किसी भी हसीना ने आज तक मुझे घास नहीं डाला,
पर कल तो दो-दो महिलाओं ने मुझको परपोस कर डाला,
उनमें एक का रंग गौरा था एक का काला,
रंगभेद में कैसे फसता ये बेचारा,
इसलिए मैंने दोनों को नकारा,
इसे कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा, 
कुछ दिनों से मैंने कविता का शौक पाला,
खुले मंच का फोरम भी भर डाला,
सुनाने वाला कैसा भी हो सुनने वालों को तो सुनना पड़ेगा सारा,
मगर कुछ श्रोताओं ने जेब से रुई को निकाला,
इसे कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा।
लेखक- रितेश गोयल 'बेसुध'

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