ख्वाब मेरा
आकर ख़्वाबों मे मेरे रोज़ क्यों मुझको इतना सताती हो,
फिरा कर हाथ जुल्फों में मेरी कहाँ चली जाती हो,
आँखें बंद करते ही सामने और खोलते ही गायब हो जाती हो,
अक्सर महसूस करता हुँ मैं स्पर्श तुम्हारा गालों पर,
तड़पता हुँ पाने को एक आलिंगन तुम्हारा,
तुम क्यों नही देकर एक जादू की जप्पी अपनी बाहों में मुझे सुलाती हो,
सच कहता हूँ जानेमन मुझे आँख बंद करते ही सिर्फ तुम नज़र आती हो।
लेखक- रितेश गोयल 'बेसुध'
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