मोहब्बत पैसों की
रईसी दिखाने को अपनी महँगी गाड़ी से आई हो,
खून से लिखे थे जो ख़त तुमको क्या वो भी लाई हो,
आँखों में देख कर लगता हैं तुम्हारी मोहब्बत अब भी ज़िंदा है हमारी,
मगर जताती हो ऐसे जैसे मेरी तस्वीर जला कर आई हो,
रईसी दिखाने को अपनी महँगी गाड़ी से आई हो,
तोड़ना चाहती हो रिश्ते मुझसे सारे के सारे,
ठीक है मगर ये तो बताओ मेरी दी पोशाक क्यों पहन कर आई हो,
तुम्हारा होने वाला शौहर कितना कमाता हैं मुझे यही जताना हैं,
इसलिए उसके दिए तोहफों से खुद को सज़ा कर आई हो,
अमीरी दिखाने को अपनी महँगी गाड़ी से आई हो,
ये महँगी घड़ियाँ, कीमती फोन, हीरे की अँगूठी और हाथों के कंगन सब तुम्हें मुबारक हो,
इस 'बेसुध' का तो हैं बस इतना सा कहना मोहब्बत को बेच कर अच्छी कीमत पाई हो,
रईसी दिखाने को अपनी महँगी गाड़ी से आई हो,
अमीरी दिखाने को अपनी महँगी गाड़ी से आई हो।
लेखक- रितेश गोयल 'बेसुध'
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