अधूरी मोहब्बत-sadshayari
इश्क़ करके भी हम अकेले रह गए,
मेरी मेहबूब को हम लुभाते नहीं,
इश्क़ मेरा ये एक तरफा रह गया,
वो हम को दिल में बसाते नहीं,
काश उस दिन वो बरखा बरसती नहीं,
तो वो छत पर अपने आते नहीं,
वो बिजली कड़क कर चमकती नहीं,
तो उन को हम दिल में बसाते नहीं,
इश्क़ मेरा वो पहला अधूरा रह गया,
ये हम किसी को बताते नहीं,
वो छत पर सुखे सब कपड़े ले गयी,
एक नज़र भर भी उसने हमे देखा नहीं,
इस अधूरी मोहब्बत का असर ये हुआ,
अब छत पर हम कपड़े सुखाते नहीं।
लेखक- रितेश गोयल 'बेसुध'
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