दोगला इश्क
दो चेहरे लेकर मेरी जिंदगी में आई तुम,
एक छुपाया था एक दिखाया था,
अल्फाजों की क्या बात करें अरमान भी मेरे खाक हो गए,
इश्क में वक्त तो क्या हम बेवक्त ही बर्बाद हो गए,
तुम्हें मिलना तो दूर तुम्हारे बारे मे सोचना भी नहीं चाहते,
तुम्हारी यादों से खुद के हृदय को खरोचना भी नहीं चाहते,
खैर अब तुम जाने दो ये इश्क-विश्क की बातें सब,
तुम जैसे दोगले लोगों के शिकंजे में हम खुद को दबोचना भी नहीं चाहते,
तुम्हारे इश्क ने हमको दिलजला बना दिया,
दोबारा दिल लगाने के बारे में हम सोचना भी नहीं चाहते।
लेखक-रितेश गोयल 'बेसुध'
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