नेता और कुत्ता
कुत्ता मरा पड़ा था,नेता बगल में खड़ा था,
जिद्द पर अड़ा था,इस कुत्ते को मैं इंसाफ दिलवाऊंँगा,
इसके परिवार का मैं खास हूंँ,इनकी इकलौती आस हूंँ,
हो सका तो इन के हक के लिए मैं संसद तक जाऊंँगा, भूख हड़ताल करवाऊँगा,मगर इस कुत्ते के परिवार को मुआवजा दिलवाऊँगा,
जनता चुपचाप खड़ी देख रही थी,
नेता की नौटंकी से आंखें सेंक रही थी,
और मन ही मन बोल रही थी,
जिंदा लोगों का हक खाने वाला मरे कुत्ते को इंसाफ दिलवाएगा,
अजी रहने दो ऐसा ऐसा कभी नहीं आएगा,
सच कुछ और है मैं तुम्हें बताता हूंँ,
नेता की ठनी पड़ी थी,
आने वाले चुनाव में हार सामने खड़ी थी,
बचने का उसे कोई उपाय न सूझा,
मुर्गी से बन गया राजनीति में चूजा,
नेता में अब बाकी नहीं रहा था जिगर और गुद्दा, इसलिए कुत्ते की मौत का बना दिया राजनैतिक मुद्दा।
खैर नेता तो आम जनता को हरदम ठगता आया है, मगर यह विचित्र नेता था जिसने कुत्तों पर हाथ आजमाया है,
हम उसके इस कौशल को प्रणाम करते हैं,
उसके दिल से कुत्ता होने को सलाम करते हैं।
लेखक-रितेश गोयल 'बेसुध'
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