तुलना

तुलना के तराजू पर हम हर किसी को तोलते हैं,
वो कम ये ज्यादा बस यहीं बोलते हैं,
पैसों की खातिर अपनी ईमानदारी में बेईमानी का जहर घोलते हैं,
जो मिला हैं उसमें खुशी ढूंढने के बजाय,
जो नहीं हैं उसके पीछे दौड़ते हैं,
साहब हम आज के युवा हैं,
हर रिश्ता लाभ और हानि की कैसोटी पर जोड़ते हैं। लेखक-रितेश गोयल 'बेसुध' 

No comments