पिता

अपने आँगन के वृक्ष सा खड़ा सब कुछ सह जाता है,
हर मौसम की मार से अपने घर को बचाता हैं ,
उसकी शीतल छाव में रहकर बढ़ा ही मज़ा आता हैं ,
घऱ में सब को मीठे फ़ल देता ख़ुद पतझड़ सा झड़ जाता हैं ,
अपनों की ख़ातिर पिता कुछ भी कर जाता हैं। 

By- Ritesh Goel 'Besudh'

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