बचपन का प्यार

इश्क़ मेरा आखिरी दफा दिखा था तेरे मोहल्ले में,
तब से वो लौट कर मेरे पास नहीं आया,
घर वाले मुझे जमा करवाना चाहते हैं शादी के कैदखाने में,
पर उन्हें क्या बताऊ वो तो मेरे बचपन का प्यार था जो जवानी तक नहीं आया,
मोहब्बत की ये बेड़ियाँ मुझको जकड़े जा रही हैं,
अजी लौटा दो दिल मेरा जो लिपटा था मेरे दिये आख़िरी गुलाब में,
इससे पहले की मैं किसी और का हो जाऊ,
कह दे अलविदा मेरे सभी खतों के जवाब में। 
लेखक- रितेश गोयल 'बेसुध'

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