पति
तेरा जीवनसाथी तुझे इशारों पर नचाएगा,
तू उसके हाथों की कठपुतली बन रह जाएगा,
पत्नी-व्रता तुझको हर रिश्तेदार बुलाएगा,
एक बार जो तू पति बन जाएगा।
घोड़ी चढ़कर आता है,अपना बैंड बजवाता है,
जिंदगी भर की मुसीबत खुद ही मोल लाता है,
इस तरह एक लड़का पति बन जाता है,
दूसरे की बला अपने घर पर लाता है,
फिर उसे अपने सिर-माथे पर बैठता है,
मिलन की खातिर सूली पर चढ़ जाता है,
इस तरह एक लड़का पति बन जाता है,
अपनी मर्जी से अब वह कुछ भी कर नहीं पाता है, उसका हर फैसला जीवनसाथी से जुड़ जाता है,
अपनी तनख्वाह में से सिर्फ अब वो पॉकेट मनी पाता है,
इस तरह एक लड़का पति बन जाता है,
उसे पूरी तरह से बदल दिया जाता है,
उसकी हर एक बात में वह हामी भरता जाता है,
जोरू के गुलाम का तमगा वह घरवालों से पाता है,
इस तरह एक लड़का पति बन जाता हैं।
दिहाड़ी कमा कर सारी मजदूरी बीवी को थमाता है, छुट्टी वाले दिन भी जोरू की नौकरी बजाता है,
साहब वो बेचारा मजदूर पति कहलाता है।
लेखक-रितेश गोयल 'बेसुध'
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